कौशांबी के राजा शूरसेन की कहानी

             !!कौशांबी के राजा शूरसेन की कहानी!!
    कौशांबी के राजा शूरसेन से उनके मंत्री भद्रक ने पूछा- राजन! आप श्रीमंत हैं एक से एक बढ़कर विद्यालयों को राजकुमार की शिक्षा के लिए नियुक्त कर सकते हैं फिर इन पुष्प से कोमल बालको  को को बंद प्रदेशों में बने गुरुकुल में क्यों भेजते हैं वहां तो सुविधाओं का सर्वथा अभाव है ऐसी कष्ट साध्य जीवन चर्या में बालकों को धकेलना उचित नहीं।
     शूरसेन बोले- हे भद्रक जिस प्रकार दबाने से हर वस्तु सुदृढ़ होती है उसी प्रकार मनुष्य भी कष्ट साध्य जीवन चर्या से पर इसमें धैर्यवान साहसी एवं अनुभवी बनता है वातावरण का नई आयु में सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है ऋषि संपर्क और कष्ट साध्य जीवन इन दोनों ही सुविधाओं को हम राजमहल में उत्पन्न नहीं कर सकते यहां तो हम उन्हें बिलासी ही बना सकते हैं  आज तो  मोह  को प्रधानता न देकर राजकुमारों के उज्जवल भविष्य को देखते हुए इन्हें गुरु अनुशासन में रहने के लिए भेजना ही उचित है।
     तरक और कारणों को समझते हुए भद्रक ने तीनों राजकुमारों को कौशांबी के स्कूलों तक पहुंचाने का प्रबंध कर दिया।

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